‘रंगभूमि’ उपन्यास के पात्र सूरदास और उनके सामाजिक उद्देश्य: गांधीजी के सिद्धांतों से तुलना

Permalink: rangbhumi-surdas-gandhi-siddhant

Focus Keywords:

Meta Description (160 characters):
जानें ‘रंगभूमि’ के सूरदास और उनके सामाजिक उद्देश्यों की तुलना गांधीजी के सिद्धांतों से। प्रेमचंद की इस कृति का गहन विश्लेषण पढ़ें।

परिचय

मुंशी प्रेमचंद का उपन्यास ‘रंगभूमि’ भारतीय साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह उपन्यास सामाजिक न्याय, सत्याग्रह और गरीबों के अधिकारों के लिए संघर्ष की कहानी है। इसके प्रमुख पात्र सूरदास का चरित्र गांधीजी के सिद्धांतों से मेल खाता है। यह लेख सूरदास की गतिविधियों और उनके सामाजिक उद्देश्यों की तुलना महात्मा गांधी के विचारों से करेगा।

सूरदास का चरित्र और उसकी सामाजिक गतिविधियाँ

सूरदास एक अंधे भिक्षुक होते हुए भी समाज में हो रहे अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वाले व्यक्ति हैं। वे शोषितों, गरीबों और वंचितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं।

सूरदास की प्रमुख गतिविधियाँ:

  1. सत्ता के खिलाफ संघर्ष:
    • सूरदास एक अमीर व्यवसायी जॉन सेवक द्वारा अपनी जमीन छीने जाने के विरुद्ध खड़े होते हैं।
    • वे किसानों और मजदूरों को एकजुट कर अन्याय के खिलाफ आंदोलन छेड़ते हैं।
  2. सत्य और अहिंसा का मार्ग:
    • सूरदास अपने विरोध में कभी हिंसा का सहारा नहीं लेते, बल्कि गांधीजी के सत्याग्रह के सिद्धांत का पालन करते हैं।
    • वे अपनी जमीन को बचाने के लिए कानूनी और सामाजिक रूप से संघर्ष करते हैं।
  3. जनता के हक की लड़ाई:
    • वे गरीबों को संगठित कर उनके अधिकारों की रक्षा करते हैं।
    • सूरदास शोषण के खिलाफ संघर्ष में आम जनता को जागरूक करने का कार्य करते हैं।

गांधीजी के सिद्धांत और उनकी तुलना सूरदास से

महात्मा गांधी का जीवन सत्य, अहिंसा और आत्मनिर्भरता के सिद्धांतों पर आधारित था। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सत्याग्रह और अहिंसक आंदोलन किए, जो सूरदास के संघर्ष से मेल खाते हैं।

सूरदास बनाम गांधीजी – एक तुलनात्मक अध्ययन

विशेषताएँसूरदासमहात्मा गांधी
सत्याग्रहअन्याय के विरुद्ध सत्याग्रह करते हैंअसहयोग आंदोलन, दांडी यात्रा जैसे सत्याग्रह किए
अहिंसाहिंसा से दूर रहकर संघर्ष करते हैंअहिंसा को ही सबसे बड़ा हथियार मानते थे
सामाजिक न्यायगरीबों और दलितों के अधिकारों की रक्षा करते हैंहरिजन आंदोलन, दलित उत्थान के लिए कार्य किया
आत्मनिर्भरतादूसरों पर निर्भर न रहकर खुद निर्णय लेते हैंस्वदेशी आंदोलन के माध्यम से आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया

गांधीवाद और ‘रंगभूमि’ में सामाजिक संदेश

  • शोषण के खिलाफ लड़ाई: जैसे गांधीजी ब्रिटिश शासन के शोषण के खिलाफ लड़े, वैसे ही सूरदास पूंजीवादी शोषण का विरोध करते हैं।
  • सत्य और नैतिकता: दोनों ही पात्र नैतिकता और न्याय के पक्षधर हैं।
  • अहिंसा और धैर्य: दोनों ने ही धैर्य और शांतिपूर्ण तरीके से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया।
  • सामाजिक समरसता: गांधीजी जात-पात और छुआछूत के खिलाफ थे, सूरदास भी समानता का समर्थन करते हैं।

रंगभूमि और गांधीवाद: आज के संदर्भ में प्रासंगिकता

  1. सामाजिक अन्याय:
    • आज भी समाज में अमीर-गरीब के बीच असमानता बनी हुई है।
    • सूरदास की लड़ाई आज भी श्रमिकों और किसानों के संघर्ष का प्रतीक बनी हुई है।
  2. अहिंसा और सत्याग्रह:
    • गांधीवादी सिद्धांत आज भी राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में देखे जा सकते हैं।
    • लोकतांत्रिक आंदोलनों में सत्याग्रह और अहिंसात्मक विरोध का महत्त्व बना हुआ है।
  3. आर्थिक असमानता:
    • पूंजीवाद के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए गांधीवादी अर्थशास्त्र और आत्मनिर्भरता पर ध्यान देना आवश्यक है।

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. ‘रंगभूमि’ उपन्यास में सूरदास का क्या महत्व है?

सूरदास उपन्यास के केंद्रीय पात्र हैं, जो सत्य, अहिंसा और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करते हैं।

2. गांधीजी के कौन-कौन से सिद्धांत सूरदास से मेल खाते हैं?

सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समानता के सिद्धांत सूरदास के विचारों से मेल खाते हैं।

3. क्या सूरदास और गांधीजी दोनों के संघर्ष में कोई समानता है?

हाँ, दोनों ही अन्याय के खिलाफ अहिंसात्मक संघर्ष करते हैं और शोषित वर्ग के अधिकारों की रक्षा करते हैं।

4. ‘रंगभूमि’ का सामाजिक संदेश क्या है?

यह उपन्यास गरीबों और मजदूरों के हक की लड़ाई, अन्याय के खिलाफ सत्याग्रह, और पूंजीवादी शोषण के विरोध की सीख देता है।

5. क्या ‘रंगभूमि’ आज के समाज में भी प्रासंगिक है?

बिल्कुल, उपन्यास में वर्णित सामाजिक मुद्दे आज भी कई क्षेत्रों में मौजूद हैं, और गांधीवादी विचारधारा अभी भी समाधान का मार्ग दिखाती है।

निष्कर्ष

‘रंगभूमि’ उपन्यास में सूरदास का संघर्ष गांधीवादी सिद्धांतों के बहुत करीब है। प्रेमचंद ने सूरदास के माध्यम से समाज के कमजोर वर्गों के लिए आवाज उठाई, जो गांधीजी के विचारों के समान ही है। यह उपन्यास आज भी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक असमानता के खिलाफ एक प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top